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ट्रंप के 50% टैरिफ इफेक्ट से भारत कैसे निपटे?—4 बड़े रास्ते

अमेरिका द्वारा भारत पर कुल ~50% आयात शुल्क से टेक्सटाइल, जेम्स-ज्वैलरी, मोबाइल आदि पर दबाव बढ़ा। जानें—भारत के 4 व्यावहारिक विकल्प, संभावित ग्रोथ-इम्पैक्ट और झुंझुनू के निर्यातकों के लिए क्या मायने हैं।

इस महीने की शुरुआत में अमेरिका ने भारत पर अतिरिक्त 25% आयात शुल्क लगाया, जिससे कुल टैरिफ ~50% तक पहुँच गया। पीएम मोदी ने अगले ही दिन कहा—“किसानों, पशुपालकों और मछुआरों के हितों पर कोई समझौता नहीं होगा।”

ताज़ा स्थिति:
तारीखकदमप्रभाव
शुरुआती अगस्त 2025अमेरिका ने भारत पर 25% टैरिफ लागू कियाभारतीय निर्यात महँगा
6–7 अगस्त 2025अतिरिक्त 25% शुल्क की घोषणा/आदेश—कुल ~50%टेक्सटाइल, जेम्स-ज्वैलरी, मोबाइल आदि पर दबाव
13 अगस्त 2025विकास दर पर असर को लेकर 0.4–0.8% तक डाउनसाइड की चेतावनीग्रोथ रिस्क पर मॉर्गन स्टैनली/अन्य हाउसेज़ की रिपोर्टें

रॉयटर्स/एपी की रिपोर्ट्स में अतिरिक्त 25% से कुल शुल्क ~50% होने का उल्लेख है। मॉर्गन स्टैनली ने लंबे समय तक शुल्क बने रहने पर विकास में 0.4–0.8 प्रतिशत अंक तक जोखिम बताया है।

1) अमेरिकी बाजार पर निर्भरता घटाएँ, बाज़ार विविधीकरण बढ़ाएँ

विशेषज्ञों के अनुसार भारत के सिर्फ लगभग एक-छठे माल निर्यात अमेरिका जाते हैं—सबसे ऊपर स्मार्टफोन, फिर डायमंड/जेम्स और दवाइयाँ। वैकल्पिक बाज़ार उपलब्ध हैं, इसलिए डाइवर्सिफिकेशन व्यावहारिक रास्ता है।
क्या करना होगा: यूरोप, मध्य-पूर्व, अफ्रीका, ASEAN में ऑर्डर री-रूट; FTA/मिनी-डील्स तेजी से क्लोज; लॉजिस्टिक्स/क्रेडिट गारंटी सपोर्ट।
जोखिम: कुछ बाज़ारों पर अमेरिकी दबाव/द्वितीयक प्रतिबंध का जोखिम; ट्रांस-शिपमेंट नियम स्पष्ट रखने होंगे।

2) बहुपक्षीय/ब्रिक्स चैनल मज़बूत करें, सप्लाई रिस्क बाँटें

ताज़ा कवरेज बताती है कि भारत समायोजन के बजाय दृढ़ रुख ले रहा है—निर्यातकों के लिए समर्थन विकल्प और वैकल्पिक भागीदारी पर काम चल रहा है। ब्रिक्स/अन्य मंचों पर समन्वय और ऊर्जा/रक्षा सप्लाई में विविधीकरण लागत घटा सकता है।
क्या करना होगा: सेटलमेंट/पेमेंट चैनलों का जोखिम-प्रूफिंग, क्रिटिकल इनपुट्स (चिप्स, फार्मा API, मशीनरी) के लिए “चीन-प्लस/रूस-प्लस” सोर्सिंग का मिश्रण।
जोखिम: भू-राजनीतिक उतार-चढ़ाव; भागीदार देशों के अमेरिका से समानांतर डील करने की संभावना बनी रहती है।

3) घरेलू मांग बढ़ाएँ—1.4 अरब का बाजार “शॉक एब्ज़ॉर्बर”

भारत का बड़ा हिस्सा डोमेस्टिक कंसम्प्शन से चलता है; ऐसे में सरकार/उद्योग मिलकर घरेलू सेल-थ्रू बढ़ाकर निर्यात-स्पेसिफिक झटके का हिस्सा एब्ज़ॉर्ब कर सकते हैं। मॉर्गन स्टैनली/अन्य अनुमानों के मुताबिक ग्रोथ-रिस्क 0.4–0.8% तक है—इस गिरावट को खपत-प्रोत्साहन, ई-कॉमर्स, MSME क्रेडिट, PLI/स्टेट इंसेंटिव से ऑफसेट किया जा सकता है।
क्या करना होगा: GST रिफंड/ड्रॉ-बैक तेज़, ई-कॉमर्स लॉजिस्टिक्स सब्सिडी, ग्रामीण-खपत स्कीम, इलेक्ट्रॉनिक्स/फार्मा में “मेड-इन-इंडिया” पुश।
जोखिम: आय-वृद्धि/महँगाई संतुलन; तुरंत 100% सब्स्टीट्यूशन संभव नहीं।

4) टार्गेटेड रिटैलियेटरी टैरिफ/ट्रेड-ऑफर

नीति विकल्पों में अमेरिकी सामानों पर टार्गेटेड काउंटर-ड्युटीज भी शामिल हैं—पर इसका इस्तेमाल रणनीतिक तौर पर और बातचीत/समझौते के साथ करना होगा ताकि वैल्यू-चेन पर उल्टा असर न पड़े। मौजूदा कवरेज में सरकार क्रेडिट गारंटी/फिस्कल सपोर्ट और बातचीत—दोनों ट्रैक पर चल रही है।
क्या करना होगा: जिन HS-कोड्स पर घरेलू विकल्प/विविध सोर्सिंग है, वहाँ सीमित/समयबद्ध ड्युटीज; सेवाओं (आईटी/आईटीईएस) को विवाद से बाहर रखना।
वर्तमान उपाय मुख्यतः गुड्स टैरिफ हैं; सेवाएँ अब तक प्रत्यक्ष शुल्क के दायरे से बाहर हैं।

ग्रोथ पर असर:
  • RBI ने फिलहाल वार्षिक ग्रोथ 6.5% का अनुमान बरकरार रखा है; अनिश्चितता मानते हुए भी केंद्रीय बैंक ने पाथवे को मॉनिटर करने की बात कही है |
  • मॉर्गन स्टैनली/सिटी: यदि 50% ड्युटीज़ लंबे समय तक रहें, तो 0.4–0.8 प्रतिशत अंक तक ग्रोथ नीचे आ सकती है।

राजस्थान/मारवाड़ में टेक्सटाइल, हैंडीक्राफ्ट, जेम्स-ज्वैलरी, फार्मा-ट्रेडिंग से जुड़े व्यापारी/एमएसएमई पर ऑर्डर वर्किंग-कैपिटल दबाव बढ़ सकता है। सरकार की क्रेडिट गारंटी/एक्सपोर्ट इंसेंटिव योजनाओं और वैकल्पिक बाज़ारों का तुरंत लाभ उठाना फायदेमंद रहेगा।

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